हापुड़. 91वें एकेडमी अवार्ड में हापुड़ की बेटियों की पृष्ठभूमि पर बनी शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री ‘पीरियड: द एंड ऑफ सेंटेंस’ को ऑस्कर मिला है। इस फिल्म में मुख्य किरदार स्नेहा ने अदा किया है। उन्होंने अपने गांव काठी खेड़ा में सैनेटरी पैड बनाने वाली यूनिट में काम किया और बाकी लड़कियों को भी इसके लिए प्रेरित किया। इन लड़कियों के संघर्ष पर ही शॉर्ट फिल्म बनी थी। स्नेहा ने कहा कि उन्हें सैनेटरी पैड बनाने पर ताने सुनने को मिलते थे, लेकिन धीरे-धीरे सोच बदली और अब उनके गांव की 70% महिलाएं पीरियड्स पर बात करने में नहीं शर्मातीं। फिल्म को ऑस्कर मिलने के बाद भास्कर प्लस ऐप ने स्नेहा से बातचीत कर उनकी कहानी जानी...
फिल्म को ऑस्कर मिलने के बाद भास्कर प्लस ऐप ने स्नेहा से बातचीत कर उनकी कहानी जानी
आपको इस फिल्म में कैसे मौका मिला?
स्नेहा : हमारे गांव में संस्था एक्शन इंडिया ने सेनेटरी पैड बनाने की एक यूनिट लगा रखी है। पिछले डेढ़-दो साल से मैं भी उसमें काम करती हूं। एक दिन बताया गया कि अमेरिका से कुछ लोग फिल्म बनाने आ रहे हैं। फिल्म बनाने वालों ने कई लोगों से बात की। फिर मुझे और गांव की ही सुमन को सेलेक्ट कर हम लोगों की जिंदगी पर ही फिल्म बनाई गई। फिल्म में कुछ भी अलग से नहीं जोड़ा गया है। पीरियड्स के इर्दगिर्द हमारी क्या रूटीन लाइफ होती है, क्या स्ट्रगल होता है, यही बताया गया।
जब आपने इस संस्था में काम करने के लिए हामी भरी तो किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा?
स्नेहा : इस संस्था से जब पैड बनाने के काम का ऑफर मिला तो मेरे दिमाग में यही था कि इन पैसों से अपनी कोचिंग की फीस जमा कर दूंगी। मां को तो सही-सही बता दिया, लेकिन पिता को बताया कि बच्चों के डायपर बनाने का काम करना है। गांव की महिलाएं कभी-कभी ताना मारती थीं। कहती थीं कि यही काम मिला है? 2 हजार से क्या होता है? मुझे भी कभी-कभी अजीब लगता था लेकिन सच तो यही था कि हम महिलाओं की बेहतर जिंदगी के लिए प्रयास कर रहे थे। साथ ही खुद की जरूरतें पूरी कर रहे थे। अब खुशी है कि गांव की लगभग 70% महिलाएं पीरियड्स पर बात करने से शर्माती नहीं हैं।
कभी आप अपनी लाइफ को लेकर डिप्रेस भी हुई हैं?
स्नेहा : बिलकुल, मैं सुबह उठकर घर की साफ सफाई करती हूं। जानवरों को चारा देना, फिर मंदिर जाना और अपनी पढ़ाई और प्रैक्टिस करना। साथ ही संस्था का भी काम करती हूं। लेकिन जब पिछले साल दिल्ली पुलिस में भर्ती नहीं हो पाई, तब बहुत दुख हुआ। तब पिता ने मुझे संभाला। तब तक मेरी मां ने उन्हें बता दिया था कि मैं संस्था में क्या काम करती हूं? इसके बावजूद उन्होंने मुझे मोटिवेट किया। उन्होंने मुझे संस्था के साथ बने रहने का हौसला दिया।
जब आपको फिल्म ऑफर हुई तो आपने क्या सोच कर उसके लिए हामी भरी?
स्नेहा : मेरे पिता किसान हैं। गांव में उनकी वजह से मैं जानी जाती हूं। मेरा सपना है कि लोग मेरी वजह से मेरे पिता को जानें, इसलिए मैं पुलिस में जाना चाहती हूं। बस उसी सपने की वजह से मैंने फिल्म की। कभी नहीं सोचा था कि यह छोटी-सी फिल्म इतना बड़ा अवार्ड जीत लेगी।
अब क्या सपना है, फिल्म लाइन में ही करियर बनाना है या कुछ और करना है?
स्नेहा : मेरा सपना दिल्ली पुलिस में भर्ती होना है। यह सपना मैंने बचपन से देखा है। 2018 में मैंने फिजिकल निकाल लिया था। लेकिन लिखित परीक्षा में कुछ नंबरों से पीछे रह गयी। मैं अभी भी उसकी तैयारी कर रही हूं। हालांकि, अभी कोई वैकेंसी नहीं आई है। यूपी पुलिस की परीक्षा दी है। अब देखें क्या रिजल्ट आता है?
अभी आप अमेरिका में हैं, कैसा अनुभव रहा आपका?
स्नेहा : मैं रेड कारपेट पर चली। मैंने जिंदगी में इतने कैमरे नहीं देखे, जितने यहां देखे हैं। जिस समय ऑस्कर अनाउंस हुआ, उस समय मैं एआर रहमान के साथ बैठी थी। मैं तब चीख पड़ी थी। रहमान साहब ने मेरा फोटो अपने मोबाइल में खींचा और मेरे साथ सेल्फी भी ली। जो लड़की हापुड़ से दिल्ली तक नहीं गई, उसके लिए यह गौरवान्वित करने वाला पल था।
Wednesday, February 27, 2019
Thursday, February 21, 2019
कांग्रेस का आरोप- जवानों पर आतंकी हमला हुआ, झील में शूटिंग करते रहे PM मोदी
जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद 7 दिन तक चुप रहने के बाद कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर हमला बोला है. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि जब 14 फरवरी को दोपहर में पुलवामा में आतंकी हमले में हमारे 40 जवानों की शहादत हुई तो पूरा देश शोक मना रहा था. उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शाम तक कॉर्बेट पार्क में एक फिल्म की शूटिंग में व्यस्त थे. क्या दुनिया में ऐसा कोई पीएम है?
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि पुलवामा में 3 बजकर 10 मिनट पर हमला हुआ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शाम 6.10 बजे तक शूटिंग कर रहे थे. जबकि देश हमारे शहीदों के टुकड़े चुन रहा था और पीएम मोदी अपने नाम के नारे लगवा रहे थे. आतंकी हमले में जवानों की शहादत के बाद देश के घरों में चूल्हे बंद थे और पीएम उत्तराखंड के रामनगर के गेस्ट हाउस में चाय नाश्ता कर रहे थे.
कांग्रेस ने कहा कि शायद ही दुनिया में किसी देश के प्रधानमंत्री ने ऐसा कभी किया हो. इस देश का प्रधानमंत्री पुलवामा हमले के बाद चार घंटे तक वन विहार करता रहे. देश शहीदों के टुकड़े चुन रहा था, तब पीएम नरेंद्र मोदी जलसे कर रहे थे. हमले के बाद 3 घंटे तक शूटिंग कर रहे थे. ऐसे प्रधानमंत्री को क्या कहा जाए, मेरे पास शब्द नहीं हैं.
सुरजेवाला ने कहा कि हमले के बाद भी प्रधानमंत्री नौका विहार करते रहे. उनकी सभाएं नहीं रुकीं. मंत्रियों ने शहीदों के ताबूत के साथ सेल्फी ली. देश अभी शोक में डूबा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सैर-सपाटे के लिए विदेश दौरे पर चले गए हैं. पालम एयरपोर्ट पर भी शहीदों के ताबूत पीएम नरेंद्र मोदी का इंतजार करते रहे, लेकिन वे वहां लेट पहुंचे.
कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि हम पुलवामा के कायराना हमले पर निर्णायक कार्रवाई की मांग करते हैं. इंदिरा गांधी ने न केवल बांग्लादेश को आजादी दिलवाई बल्कि नियाजी को 91000 पाक सैनिकों के साथ समर्पण करना पड़ा था. पाकिस्तान को इंदिरा गांधी ने धूल चटाने का काम किया था.
सुरजेवाला ने कहा, 'हमने आतंकी हमले का करारा जवाब देने के लिए सरकार को पूरा समर्थन दिया है, लेकिन मोदीजी राजधर्म भूलकर राज बचाने में लगे हैं. सत्ता की भूख में मोदीजी ने इंसानियत को भुला दिया है.'
कांग्रेस ने कहा कि मोदी और शाह को आतंकी हमले पर राजनीति करने की पुरानी आदत है. अमित शाह जवानों की शहादत पर राजनीति कर रहे हैं. शाह कांग्रेस के खिलाफ भड़काऊ भाषण दे रहे थे. असम की रैली में शाह ने कहा कि शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, क्योंकि कांग्रेस नहीं बीजेपी की सरकार है.
सुरजेवाला ने 26/11 मुंबई हमले के दौरान का नरेंद्र मोदी का वीडियो दिखाया, जिसमें वो कांग्रेस सरकार की आलोचना कर रहे थे. कांग्रेस ने कहा कि जबकि हम सरकार के साथ खड़े थे. संकट की इस घड़ी में देश शहीदों के साथ है और आतंकियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की मांग कर रहा है, लेकिन मोदी और शाह इस पर राजनीति कर रहे हैं.
कांग्रेस ने कहा कि हमने पहले भी पाक को सबक सिखाया है. 1971 में पाक को करारा जवाब दिया था. इंदिरा गांधी ने शिकस्त दी. जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए सत्ता की लालसा शहीदों के सम्मान से बड़ी है. वो सत्ता की भूख में शहादत को भी भूल गए. उदाहारण के तौर पर कांग्रेस ने बताया कि मोदी ने 26/11 हमले के तुरन्त बाद मुंबई में भाषण दिया था. रक्तरंजित इश्तेहार देकर वो दो दिन बाद ही वोट बटोरने की कोशिश कर रहे थे. शहादत की अपमान का उदाहरण मोदी ने पेश किया. ऐसा कोई उदाहरण संसार में नहीं है.
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि पुलवामा में 3 बजकर 10 मिनट पर हमला हुआ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शाम 6.10 बजे तक शूटिंग कर रहे थे. जबकि देश हमारे शहीदों के टुकड़े चुन रहा था और पीएम मोदी अपने नाम के नारे लगवा रहे थे. आतंकी हमले में जवानों की शहादत के बाद देश के घरों में चूल्हे बंद थे और पीएम उत्तराखंड के रामनगर के गेस्ट हाउस में चाय नाश्ता कर रहे थे.
कांग्रेस ने कहा कि शायद ही दुनिया में किसी देश के प्रधानमंत्री ने ऐसा कभी किया हो. इस देश का प्रधानमंत्री पुलवामा हमले के बाद चार घंटे तक वन विहार करता रहे. देश शहीदों के टुकड़े चुन रहा था, तब पीएम नरेंद्र मोदी जलसे कर रहे थे. हमले के बाद 3 घंटे तक शूटिंग कर रहे थे. ऐसे प्रधानमंत्री को क्या कहा जाए, मेरे पास शब्द नहीं हैं.
सुरजेवाला ने कहा कि हमले के बाद भी प्रधानमंत्री नौका विहार करते रहे. उनकी सभाएं नहीं रुकीं. मंत्रियों ने शहीदों के ताबूत के साथ सेल्फी ली. देश अभी शोक में डूबा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सैर-सपाटे के लिए विदेश दौरे पर चले गए हैं. पालम एयरपोर्ट पर भी शहीदों के ताबूत पीएम नरेंद्र मोदी का इंतजार करते रहे, लेकिन वे वहां लेट पहुंचे.
कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि हम पुलवामा के कायराना हमले पर निर्णायक कार्रवाई की मांग करते हैं. इंदिरा गांधी ने न केवल बांग्लादेश को आजादी दिलवाई बल्कि नियाजी को 91000 पाक सैनिकों के साथ समर्पण करना पड़ा था. पाकिस्तान को इंदिरा गांधी ने धूल चटाने का काम किया था.
सुरजेवाला ने कहा, 'हमने आतंकी हमले का करारा जवाब देने के लिए सरकार को पूरा समर्थन दिया है, लेकिन मोदीजी राजधर्म भूलकर राज बचाने में लगे हैं. सत्ता की भूख में मोदीजी ने इंसानियत को भुला दिया है.'
कांग्रेस ने कहा कि मोदी और शाह को आतंकी हमले पर राजनीति करने की पुरानी आदत है. अमित शाह जवानों की शहादत पर राजनीति कर रहे हैं. शाह कांग्रेस के खिलाफ भड़काऊ भाषण दे रहे थे. असम की रैली में शाह ने कहा कि शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, क्योंकि कांग्रेस नहीं बीजेपी की सरकार है.
सुरजेवाला ने 26/11 मुंबई हमले के दौरान का नरेंद्र मोदी का वीडियो दिखाया, जिसमें वो कांग्रेस सरकार की आलोचना कर रहे थे. कांग्रेस ने कहा कि जबकि हम सरकार के साथ खड़े थे. संकट की इस घड़ी में देश शहीदों के साथ है और आतंकियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की मांग कर रहा है, लेकिन मोदी और शाह इस पर राजनीति कर रहे हैं.
कांग्रेस ने कहा कि हमने पहले भी पाक को सबक सिखाया है. 1971 में पाक को करारा जवाब दिया था. इंदिरा गांधी ने शिकस्त दी. जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए सत्ता की लालसा शहीदों के सम्मान से बड़ी है. वो सत्ता की भूख में शहादत को भी भूल गए. उदाहारण के तौर पर कांग्रेस ने बताया कि मोदी ने 26/11 हमले के तुरन्त बाद मुंबई में भाषण दिया था. रक्तरंजित इश्तेहार देकर वो दो दिन बाद ही वोट बटोरने की कोशिश कर रहे थे. शहादत की अपमान का उदाहरण मोदी ने पेश किया. ऐसा कोई उदाहरण संसार में नहीं है.
Monday, January 28, 2019
क्या ख़ुदकुशी रोकने में मददगार है नीली रोशनी
2013 में एक ऐसा रिसर्च पेपर छपा, जिसने ऑनलाइन दुनिया में तहलका मचा दिया था. सोशल मीडिया पर उस रिसर्च की बुनियाद पर लाखों पोस्ट की गईं. उस रिसर्च के आधार पर हज़ारों की तादाद में स्टोरी भी वायरल हुई थीं.
इस रिसर्च पेपर में ये इशारा किया गया था कि रेलवे स्टेशन पर नीले बल्ब या लैंप लगाने से वहां ख़ुदकुशी की तादाद में भारी कमी आई थी.
वैज्ञानिकों का दावा था कि नीले रंग से स्टेशनों को रोशन करने से आत्महत्या करने के मामलों में 84 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई.
तब से ही दुनिया भर में ये नुस्खा ख़ूब चर्चित हुआ. ये रिसर्च पेपर जापान में छपा था. इसके चर्चित होने पर ख़ुदकुशी की घटनाओं से परेशान कई और देशों ने भी ये प्रयोग किए.
लेकिन, जैसा कि हर पेचीदा वैज्ञानिक क़िस्सों के साथ होता है, नीली रोशनी से ख़ुदकुशी रोकने की बात कहने वाले रिसर्च पेपर को भी हर शेयरिंग के साथ तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया और समझा गया.
इसकी शुरुआत इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में हुई थी. तब जापान की कई रेलवे कंपनियों ने रेलवे स्टेशनों पर नीली रोशनी लगानी शुरू की.
इस कोशिश का मक़सद रेलवे स्टेशनों पर ख़ुदकुशी को रोकना था. कई बार ऐसी छोटी-छोटी बातों से लोगों के बर्ताव में बड़े बदलाव देखने को मिलते हैं.
रेलवे स्टेशनों पर नीली रोशनी करने के पीछे विचार ये था कि ये लोगों की ज़हनी कैफ़ियत पर असर डालती है. 2017 में हुई एक रिसर्च ने इस ख्याल पर मुहर लगाई थी. इस रिसर्च में पाया गया था कि दिमाग़ी तनाव के शिकार लोग अगर कुछ वक़्त नीली रोशनी से भरे कमरे में बिताते हैं, तो उनका ज़हन शांत हो जाता है.
जापान की वासेडा यूनिवर्सिटी की वैज्ञानिक मिचिको यूएडा ने रेलवे कंपनियों के इस प्रयोग के बारे में सुना था. उन्होंने रेलवे के प्रबंधकों से बात की, तो मैनेजरों ने दावा किया कि प्लेटफॉर्म पर नीली रोशनी करने के अच्छे नतीजे आए हैं. ख़ुदकुशी रोकने में ये नुस्खा काफ़ी असरदार साबित हुआ है.
मिचिको यूएडा ने जापान में ख़ुदकुशी के बढ़ते मामलों के पीछे के तमाम कारणों के बारे में रिसर्च की थी. इसके पीछे आर्थिक वजह से लेकर क़ुदरती आपदा और सेलेब्रिटी सुसाइड तक कारण पाए गए थे.
हालांकि, मिचिको ने जब रेलवे कंपनियों के नीली रोशनी से जुड़े दावे को सुना, तो उन्हें शक हुआ. उन्होंने रेलवे कंपनियों से इस बारे में आंकड़े मांगे.
मिचिको ने 71 जापानी रेलवे स्टेशनों पर पिछले दस सालों में हुए ख़ुदकुशी के आंकड़ों को खंगाला, तो उन्होंने पाया कि नीली रोशनी लगाने का कुछ फ़ायदा तो हुआ है. उन्होंने देखा कि ख़ुदकुशी के मामलों में 84 प्रतिशत तक की कमी आई है. इस दावे ने जल्द ही पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा.
जब इस रिसर्च के नतीजे मीडिया में चर्चित होने लगे, तो त्सुकुबा यूनिवर्सिटी के मसाओ इचिकावा का ध्यान भी इस दावे पर गया. उन्होंने ख़ुदकुशी के आंकड़ों की फिर से पड़ताल की.
इचिकावा का कहना था कि इस आंकड़े को दिन और रात में बांटकर देखना ज़रूरी है. क्योंकि दिन में अक्सर प्लेटफॉर्म की लाइट बुझा दी जाती हैं. ऐसे में 24 घंटे के आंकड़े के आधार पर किया गया ये दावा आत्महत्या कम होने की सही तस्वीर नहीं पेश करता.
इचिकावा का कहना है कि असल में नीली रोशनी से ख़ुदकुशी करने की तादाद में केवल 14 फ़ीसद की कमी आई थी. हालांकि ये कमी भी काफ़ी अच्छा बदलाव मानी जाएगी. लेकिन, 84 प्रतिशत के दावे से तो ये बहुत ही कम है.
इचिकावा ने कोशिश की कि वो अपने रिसर्च पेपर के ज़रिए मिचिको यूएडा के दावे का दूसरा पहलू दुनिया के सामने रखेंगे. उनका मक़सद था कि लोग ये न सोचें कि नीली रोशनी जादुई होती है. इसका लोगों पर इतना गहरा असर होता है.
इचिकावा ही नहीं, दूसरे रिसर्चर का भी यही मानना रहा है कि अगर प्लेटफॉर्म पर बैरियर और केवल गाड़ी आने पर खुलने वाले दरवाज़े लगाए जाएं, तो ये ख़ुदकुशी रोकने में ज़्यादा कारगर होंगे. लेकिन, इन्हें लगाने का ख़र्च इतना ज़्यादा है कि रेलवे कंपनियां इन पर अमल नहीं ही करेगीं. हां, प्लेटफॉर्म पर नीली रोशनी करना सस्ता सौदा है.
इस रिसर्च पेपर में ये इशारा किया गया था कि रेलवे स्टेशन पर नीले बल्ब या लैंप लगाने से वहां ख़ुदकुशी की तादाद में भारी कमी आई थी.
वैज्ञानिकों का दावा था कि नीले रंग से स्टेशनों को रोशन करने से आत्महत्या करने के मामलों में 84 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई.
तब से ही दुनिया भर में ये नुस्खा ख़ूब चर्चित हुआ. ये रिसर्च पेपर जापान में छपा था. इसके चर्चित होने पर ख़ुदकुशी की घटनाओं से परेशान कई और देशों ने भी ये प्रयोग किए.
लेकिन, जैसा कि हर पेचीदा वैज्ञानिक क़िस्सों के साथ होता है, नीली रोशनी से ख़ुदकुशी रोकने की बात कहने वाले रिसर्च पेपर को भी हर शेयरिंग के साथ तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया और समझा गया.
इसकी शुरुआत इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में हुई थी. तब जापान की कई रेलवे कंपनियों ने रेलवे स्टेशनों पर नीली रोशनी लगानी शुरू की.
इस कोशिश का मक़सद रेलवे स्टेशनों पर ख़ुदकुशी को रोकना था. कई बार ऐसी छोटी-छोटी बातों से लोगों के बर्ताव में बड़े बदलाव देखने को मिलते हैं.
रेलवे स्टेशनों पर नीली रोशनी करने के पीछे विचार ये था कि ये लोगों की ज़हनी कैफ़ियत पर असर डालती है. 2017 में हुई एक रिसर्च ने इस ख्याल पर मुहर लगाई थी. इस रिसर्च में पाया गया था कि दिमाग़ी तनाव के शिकार लोग अगर कुछ वक़्त नीली रोशनी से भरे कमरे में बिताते हैं, तो उनका ज़हन शांत हो जाता है.
जापान की वासेडा यूनिवर्सिटी की वैज्ञानिक मिचिको यूएडा ने रेलवे कंपनियों के इस प्रयोग के बारे में सुना था. उन्होंने रेलवे के प्रबंधकों से बात की, तो मैनेजरों ने दावा किया कि प्लेटफॉर्म पर नीली रोशनी करने के अच्छे नतीजे आए हैं. ख़ुदकुशी रोकने में ये नुस्खा काफ़ी असरदार साबित हुआ है.
मिचिको यूएडा ने जापान में ख़ुदकुशी के बढ़ते मामलों के पीछे के तमाम कारणों के बारे में रिसर्च की थी. इसके पीछे आर्थिक वजह से लेकर क़ुदरती आपदा और सेलेब्रिटी सुसाइड तक कारण पाए गए थे.
हालांकि, मिचिको ने जब रेलवे कंपनियों के नीली रोशनी से जुड़े दावे को सुना, तो उन्हें शक हुआ. उन्होंने रेलवे कंपनियों से इस बारे में आंकड़े मांगे.
मिचिको ने 71 जापानी रेलवे स्टेशनों पर पिछले दस सालों में हुए ख़ुदकुशी के आंकड़ों को खंगाला, तो उन्होंने पाया कि नीली रोशनी लगाने का कुछ फ़ायदा तो हुआ है. उन्होंने देखा कि ख़ुदकुशी के मामलों में 84 प्रतिशत तक की कमी आई है. इस दावे ने जल्द ही पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा.
जब इस रिसर्च के नतीजे मीडिया में चर्चित होने लगे, तो त्सुकुबा यूनिवर्सिटी के मसाओ इचिकावा का ध्यान भी इस दावे पर गया. उन्होंने ख़ुदकुशी के आंकड़ों की फिर से पड़ताल की.
इचिकावा का कहना था कि इस आंकड़े को दिन और रात में बांटकर देखना ज़रूरी है. क्योंकि दिन में अक्सर प्लेटफॉर्म की लाइट बुझा दी जाती हैं. ऐसे में 24 घंटे के आंकड़े के आधार पर किया गया ये दावा आत्महत्या कम होने की सही तस्वीर नहीं पेश करता.
इचिकावा का कहना है कि असल में नीली रोशनी से ख़ुदकुशी करने की तादाद में केवल 14 फ़ीसद की कमी आई थी. हालांकि ये कमी भी काफ़ी अच्छा बदलाव मानी जाएगी. लेकिन, 84 प्रतिशत के दावे से तो ये बहुत ही कम है.
इचिकावा ने कोशिश की कि वो अपने रिसर्च पेपर के ज़रिए मिचिको यूएडा के दावे का दूसरा पहलू दुनिया के सामने रखेंगे. उनका मक़सद था कि लोग ये न सोचें कि नीली रोशनी जादुई होती है. इसका लोगों पर इतना गहरा असर होता है.
इचिकावा ही नहीं, दूसरे रिसर्चर का भी यही मानना रहा है कि अगर प्लेटफॉर्म पर बैरियर और केवल गाड़ी आने पर खुलने वाले दरवाज़े लगाए जाएं, तो ये ख़ुदकुशी रोकने में ज़्यादा कारगर होंगे. लेकिन, इन्हें लगाने का ख़र्च इतना ज़्यादा है कि रेलवे कंपनियां इन पर अमल नहीं ही करेगीं. हां, प्लेटफॉर्म पर नीली रोशनी करना सस्ता सौदा है.
Friday, December 28, 2018
रेलवे का महिलाओं-बुजुर्गों को नए साल का तोहफा, बढ़ाई आरक्षित लोअर बर्थ की संख्या
ट्रेन में सफर के दौरान बुजुर्गों और 45 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं को अब अतिरिक्त आरक्षित लोअर बर्थ मिलेंगे. भारतीय रेलवे की ओर से हर कोच में आरक्षण कोटा बढ़ाने का निर्णय लिया है. यह सुविधा गर्भवती महिलाओं को भी मिलेगी. इस संबंध में रेलवे ने सर्कुलर जारी किया है.
वर्तमान में इस वर्ग के लोगों के लिए स्लीपर, AC-3 और AC-2 के हर कोच में कुल 12 सीटें आरक्षित हैं. स्लीपर क्लास के अंतर्गत 6 बर्थ, 3 AC और सेकंड एसी के तहत 3-3 बर्थ का कोटा तय है. वहीं राजधानी, शताब्दी और दूरंतो जैसी एसी प्रीमियम ट्रेनों में इस वर्ग के लोगों को 7 आरक्षित सीटें मिलती हैं.
बदलाव के बाद की स्थिति
नए बदलाव के बाद अब इस वर्ग के लोगों को मेल एक्सप्रेस ट्रेनों के हर कोच में 13 आरक्षित लोअर बर्थ मिलेंगे. इनमें स्लीपर में 6,3AC में 4 और 2AC में 3 सीटें आरक्षित होंगी. वहीं राजधानी, शताब्दी और दूरंतो जैसी एसी प्रीमियम ट्रेनों में प्रति कोच 9 सीटें आरक्षित होंगी.
क्यों बढ़ाई गई बर्थ
दरअसल, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं की ओर से कई बार ऐसी शिकायतें की गई हैं कि उनके कोटे की ज्यादातर लोअर बर्थ कम उम्र की महिलाओं को आवंटित कर दी जाती हैं. इससे बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को परेशानी झेलनी पड़ती है. बता दें कि हाल ही में रेलवे ने सफर के दौरान शॉपिंग की सुविधा देने का ऐलान किया था. हालांकि पहले चरण में यह सुविधा दो ट्रेनों में होगी और इसके बाद हर चरण में दो-दो ट्रेनों को जोड़ा जाएगा.इसके लिए एक निजी कंपनी को पांच साल का कॉन्ट्रैक्ट भी दिया जा चुका है.
रिपोर्ट के मुताबिक इस योजना की घोषणा 2019-20 के अंतरिम बजट में या फिर शीत सत्र के समापन के बाद की जा सकती है. इसके अलावा पहले चरण में लघु और सीमांत किसान को शामिल किया जा सकता है. बता दें कि देश भर में करीब 9 से 11 करोड़ लघु एवं सीमांत किसान हैं. इससे पहले तेलंगाना की तर्ज पर ओडिशा और झारखंड की सरकारों ने भी रैयत बंधु जैसी योजना लागू करने का एलान कर चुकी हैं.
इन विकल्पों पर भी हो रहा विचार!
इसके अलावा भी किसानों को राहत देने के लिए कई विकल्पों पर मंथन जारी है. रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और अधिकारियों के बीच छोटे और सीमांत किसानों को मुफ्त में फसल बीमा देने और उधारी योजनाओं में कुछ फेरबदल करने पर भी चर्चा हुई है. बता दें कि वर्तमान में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों से अलग-अगल फसलों के लिए 2 से 5 फीसदी तक की दर से प्रीमियम वसूला जाता है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि किसानों को आय मुहैया कराने की योजना पर सरकारी खजाने पर शुरुआती दौर में करीब 600 से 700 अरब रुपये का बोझ आने का अनुमान है. इस योजना में आने वाली कुल खर्च में केंद्र और राज्यों की हिस्सेदारी कितनी होगी, इस पर विचार हो रहा है.
वर्तमान में इस वर्ग के लोगों के लिए स्लीपर, AC-3 और AC-2 के हर कोच में कुल 12 सीटें आरक्षित हैं. स्लीपर क्लास के अंतर्गत 6 बर्थ, 3 AC और सेकंड एसी के तहत 3-3 बर्थ का कोटा तय है. वहीं राजधानी, शताब्दी और दूरंतो जैसी एसी प्रीमियम ट्रेनों में इस वर्ग के लोगों को 7 आरक्षित सीटें मिलती हैं.
बदलाव के बाद की स्थिति
नए बदलाव के बाद अब इस वर्ग के लोगों को मेल एक्सप्रेस ट्रेनों के हर कोच में 13 आरक्षित लोअर बर्थ मिलेंगे. इनमें स्लीपर में 6,3AC में 4 और 2AC में 3 सीटें आरक्षित होंगी. वहीं राजधानी, शताब्दी और दूरंतो जैसी एसी प्रीमियम ट्रेनों में प्रति कोच 9 सीटें आरक्षित होंगी.
क्यों बढ़ाई गई बर्थ
दरअसल, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं की ओर से कई बार ऐसी शिकायतें की गई हैं कि उनके कोटे की ज्यादातर लोअर बर्थ कम उम्र की महिलाओं को आवंटित कर दी जाती हैं. इससे बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं को परेशानी झेलनी पड़ती है. बता दें कि हाल ही में रेलवे ने सफर के दौरान शॉपिंग की सुविधा देने का ऐलान किया था. हालांकि पहले चरण में यह सुविधा दो ट्रेनों में होगी और इसके बाद हर चरण में दो-दो ट्रेनों को जोड़ा जाएगा.इसके लिए एक निजी कंपनी को पांच साल का कॉन्ट्रैक्ट भी दिया जा चुका है.
रिपोर्ट के मुताबिक इस योजना की घोषणा 2019-20 के अंतरिम बजट में या फिर शीत सत्र के समापन के बाद की जा सकती है. इसके अलावा पहले चरण में लघु और सीमांत किसान को शामिल किया जा सकता है. बता दें कि देश भर में करीब 9 से 11 करोड़ लघु एवं सीमांत किसान हैं. इससे पहले तेलंगाना की तर्ज पर ओडिशा और झारखंड की सरकारों ने भी रैयत बंधु जैसी योजना लागू करने का एलान कर चुकी हैं.
इन विकल्पों पर भी हो रहा विचार!
इसके अलावा भी किसानों को राहत देने के लिए कई विकल्पों पर मंथन जारी है. रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और अधिकारियों के बीच छोटे और सीमांत किसानों को मुफ्त में फसल बीमा देने और उधारी योजनाओं में कुछ फेरबदल करने पर भी चर्चा हुई है. बता दें कि वर्तमान में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों से अलग-अगल फसलों के लिए 2 से 5 फीसदी तक की दर से प्रीमियम वसूला जाता है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि किसानों को आय मुहैया कराने की योजना पर सरकारी खजाने पर शुरुआती दौर में करीब 600 से 700 अरब रुपये का बोझ आने का अनुमान है. इस योजना में आने वाली कुल खर्च में केंद्र और राज्यों की हिस्सेदारी कितनी होगी, इस पर विचार हो रहा है.
Wednesday, December 19, 2018
जेटली ही नहीं, शाह को भी नहीं पसंद खजाने पर पहरा
भारतीय जनता पार्टी देश में पार्टी विद अ डिफरेंस है. आमतौर पर राजनीतिक दल संविधान से बंधे हैं और जैसा उनका संविधान कहता है पार्टी उसपर अमल करती है. वहीं देश में जब कोई लोकतांत्रिक पार्टी चुनाव जीतकर सत्ता में आती है तो उक्त पार्टी की सरकार देश के संविधान को अमल करती है. बहरहाल, कम से कम एक मामले में न तो पार्टी और न ही पार्टी की केन्द्र में सरकार नियमों के मुताबिक चलने के लिए तैयार है.
केन्द्र सरकार में वित्त मंत्री पर केन्द्रीय रिजर्व बैंक के साथ सामंजस्य बनाने की जिम्मेदारी है. नियमों के मुताबिक केन्द्रीय रिजर्व बैंक एक स्वायत्त संस्था है और उसे देश के खजाने की निगरानी करने के लिए यह स्वायत्तता दी गई है. इस निगरानी का दारोमदार केन्द्रीय रिजर्व बैंक के गवर्नर पर रहती है. मौजूदा सरकार के साढ़े चार साल के कार्यकाल में दो केन्द्रीय बैंक गवर्नर अपने तीन साल के कार्यकाल के दौरान केन्द्र सरकार के साथ खींचतान का शिकार हुए.
जहां पूरी दुनिया में ख्याति पाने के बावजूद केन्द्र सरकार ने पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के कार्यकाल को बढ़ाने में रुचि नहीं दिखाई. वहीं, मौजूदा केन्द्र सरकार के कार्यकाल में दूसरे गवर्नर उर्जित पटेल अपना तीन साल का कार्यकाल भी पूरा किए बगैर चले गए. दोनों गवर्नर और जेटली के नेतृत्व वाला वित्त मंत्रालय नियम के मुताबिक समन्वय नहीं बैठा सका.
मोदी सरकार के बीच वे विवाद जिनसे तय थी उर्जित पटेल की विदाई
ऐसा ही मामला देश की इस पार्टी के अंदर भी साफ दिखाई दे रहा है. पार्टी का संविधान पृष्ठ 13 पर कहता है कि पार्टी अध्यक्ष राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 120 सदस्यों में से अधिक से अधिक 13 उपाध्यक्ष, 9 महामंत्री, एक महामंत्री(संगठन), अधिक से अधिक 15 मंत्री तथा एक कोषाध्यक्ष को मनोनीत करेगा. मनोनीत किए जाने वाले इन पदाधिकारियों पर पार्टी के कामकाज की अलग-अलग जिम्मेदारी होगी. संविधान में किए गए इस प्रावधान के विपरीत इस पार्टी में बीते 30 महीनों से कोषाध्यक्ष का पद खाली पड़ा है. लेकिन पार्टी अध्यक्ष अमित शाह इस पद पर राष्ट्रीय कार्यकारिणी के किसी सदस्य को मनोनीत नहीं कर पा रहे हैं.
दरअसल भारतीय जनता पार्टी के कोषाध्यक्ष का पद 16 जनवरी 2016 को तब रिक्त हो गया जब तत्कालीन कोषाध्यक्ष पियूष गोयल को केन्द्रीय कैबिनेट में जगह दे दी गई. गोयल को स्वतंत्र प्रभार के साथ खनन मंत्रालय दिया गया. इसके बाद सितंबर 2017 में रेल मंत्रालय से सुरेश प्रभु की छुट्टी के बाद गोयल को रेलवे का प्रभार दिया गया. इसके बाद एक बार फिर हाल ही में वित्त मंत्री अरुण जेटली की खराब तबीयत के चलते वित्त मंत्रालय का भी प्रभार दिया गया.
RBI गवर्नर शक्तिकांत दास के सामने 5 चुनौतियां
वहीं पीयूष गोयल के केन्द्रीय कैबिनेट में आने और प्रभारों में बदलाव के बीच पार्टी में एक व्यक्ति एक पद की नीति के चलते पार्टी बिना कोषाध्यक्ष के रही. पार्टी में एक कोषाध्यक्ष का काम पार्टी के फंड को संभालने का है. इस काम में पार्टी के दफ्तरों का खर्च, चुनाव प्रचार का खर्च, अध्यक्ष एंव अन्य पदाधिकारियों के पार्टी के काम से यात्रा का खर्च जैसे महत्वपूर्ण काम शामिल हैं. जाहिर है, सवाल खड़ा होता है कि जब जुलाई 2016 से पार्टी के पास कोई कोषाध्यक्ष नहीं है तो यह काम बीते 30 महीनों के दौरान कौन कर रहा है. खासबात है कि चुनावों के खर्च का ब्यौरा चुनाव आयोग को देने का काम भी पार्टी के कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी है. लिहाजा, पीयूष गोयल के बाद खाली पड़े इस पद की जिम्मेदारी बिना कोषाध्यक्ष के कैसे निभाई जा रही है. क्या पार्टी अध्यक्ष ने इस काम के लिए राष्ट्रीय कार्यकारिणी के किसी सदस्य को इस काम में लगाया है? यदि ऐसा है तो क्यों इस सदस्य को कोषाध्यक्ष मनोनीत नहीं किया गया है?
पार्टी में उच्च स्तरीय सूत्रों की मानें तो शीर्ष नेतृत्व में पार्टी के नए कोषाध्यक्ष को लेकर मतभेद की स्थिति है. ऐसी स्थिति में जहां पार्टी अध्यक्ष जिसे इस जिम्मेदारी के लिए मनोनीत करना चाहते हैं वह सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी को मंजूर नहीं है. वहीं राष्ट्रीय कार्यकारिणी के प्रभावी सदस्यों द्वारा सुझाए गए सदस्य पर पार्टी अध्यक्ष तैयार नहीं है. इस मतभेद के चलते पार्टी बीते 30 महीनों से बिना कोषाध्यक्ष के काम कर रही है. और सवाल यही है कि आखिर कैसे यह पार्टी बिना कोषाध्यक्ष के काम कर रही है?
केन्द्र सरकार में वित्त मंत्री पर केन्द्रीय रिजर्व बैंक के साथ सामंजस्य बनाने की जिम्मेदारी है. नियमों के मुताबिक केन्द्रीय रिजर्व बैंक एक स्वायत्त संस्था है और उसे देश के खजाने की निगरानी करने के लिए यह स्वायत्तता दी गई है. इस निगरानी का दारोमदार केन्द्रीय रिजर्व बैंक के गवर्नर पर रहती है. मौजूदा सरकार के साढ़े चार साल के कार्यकाल में दो केन्द्रीय बैंक गवर्नर अपने तीन साल के कार्यकाल के दौरान केन्द्र सरकार के साथ खींचतान का शिकार हुए.
जहां पूरी दुनिया में ख्याति पाने के बावजूद केन्द्र सरकार ने पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के कार्यकाल को बढ़ाने में रुचि नहीं दिखाई. वहीं, मौजूदा केन्द्र सरकार के कार्यकाल में दूसरे गवर्नर उर्जित पटेल अपना तीन साल का कार्यकाल भी पूरा किए बगैर चले गए. दोनों गवर्नर और जेटली के नेतृत्व वाला वित्त मंत्रालय नियम के मुताबिक समन्वय नहीं बैठा सका.
मोदी सरकार के बीच वे विवाद जिनसे तय थी उर्जित पटेल की विदाई
ऐसा ही मामला देश की इस पार्टी के अंदर भी साफ दिखाई दे रहा है. पार्टी का संविधान पृष्ठ 13 पर कहता है कि पार्टी अध्यक्ष राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 120 सदस्यों में से अधिक से अधिक 13 उपाध्यक्ष, 9 महामंत्री, एक महामंत्री(संगठन), अधिक से अधिक 15 मंत्री तथा एक कोषाध्यक्ष को मनोनीत करेगा. मनोनीत किए जाने वाले इन पदाधिकारियों पर पार्टी के कामकाज की अलग-अलग जिम्मेदारी होगी. संविधान में किए गए इस प्रावधान के विपरीत इस पार्टी में बीते 30 महीनों से कोषाध्यक्ष का पद खाली पड़ा है. लेकिन पार्टी अध्यक्ष अमित शाह इस पद पर राष्ट्रीय कार्यकारिणी के किसी सदस्य को मनोनीत नहीं कर पा रहे हैं.
दरअसल भारतीय जनता पार्टी के कोषाध्यक्ष का पद 16 जनवरी 2016 को तब रिक्त हो गया जब तत्कालीन कोषाध्यक्ष पियूष गोयल को केन्द्रीय कैबिनेट में जगह दे दी गई. गोयल को स्वतंत्र प्रभार के साथ खनन मंत्रालय दिया गया. इसके बाद सितंबर 2017 में रेल मंत्रालय से सुरेश प्रभु की छुट्टी के बाद गोयल को रेलवे का प्रभार दिया गया. इसके बाद एक बार फिर हाल ही में वित्त मंत्री अरुण जेटली की खराब तबीयत के चलते वित्त मंत्रालय का भी प्रभार दिया गया.
RBI गवर्नर शक्तिकांत दास के सामने 5 चुनौतियां
वहीं पीयूष गोयल के केन्द्रीय कैबिनेट में आने और प्रभारों में बदलाव के बीच पार्टी में एक व्यक्ति एक पद की नीति के चलते पार्टी बिना कोषाध्यक्ष के रही. पार्टी में एक कोषाध्यक्ष का काम पार्टी के फंड को संभालने का है. इस काम में पार्टी के दफ्तरों का खर्च, चुनाव प्रचार का खर्च, अध्यक्ष एंव अन्य पदाधिकारियों के पार्टी के काम से यात्रा का खर्च जैसे महत्वपूर्ण काम शामिल हैं. जाहिर है, सवाल खड़ा होता है कि जब जुलाई 2016 से पार्टी के पास कोई कोषाध्यक्ष नहीं है तो यह काम बीते 30 महीनों के दौरान कौन कर रहा है. खासबात है कि चुनावों के खर्च का ब्यौरा चुनाव आयोग को देने का काम भी पार्टी के कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी है. लिहाजा, पीयूष गोयल के बाद खाली पड़े इस पद की जिम्मेदारी बिना कोषाध्यक्ष के कैसे निभाई जा रही है. क्या पार्टी अध्यक्ष ने इस काम के लिए राष्ट्रीय कार्यकारिणी के किसी सदस्य को इस काम में लगाया है? यदि ऐसा है तो क्यों इस सदस्य को कोषाध्यक्ष मनोनीत नहीं किया गया है?
पार्टी में उच्च स्तरीय सूत्रों की मानें तो शीर्ष नेतृत्व में पार्टी के नए कोषाध्यक्ष को लेकर मतभेद की स्थिति है. ऐसी स्थिति में जहां पार्टी अध्यक्ष जिसे इस जिम्मेदारी के लिए मनोनीत करना चाहते हैं वह सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी को मंजूर नहीं है. वहीं राष्ट्रीय कार्यकारिणी के प्रभावी सदस्यों द्वारा सुझाए गए सदस्य पर पार्टी अध्यक्ष तैयार नहीं है. इस मतभेद के चलते पार्टी बीते 30 महीनों से बिना कोषाध्यक्ष के काम कर रही है. और सवाल यही है कि आखिर कैसे यह पार्टी बिना कोषाध्यक्ष के काम कर रही है?
Friday, November 23, 2018
MP में राहुल बोले- कर्नाटक-पंजाब फोन लगा कर पूछ लो, जो बोलता हूं वो जरूर होता है
मध्य प्रदेश में मतदान के लिए अब कुछ ही दिन बचे हैं. वोटिंग से पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने रायसेन में कहा कि मोदी जी ने कहा था अच्छे दिन आएंगे और साढ़े चार साल तक जनता ने इंतजार किया, लेकिन कुछ ही लोगों के लिए ही अच्छे दिन आए. इससे पहले उन्होंने शुक्रवार को विदिशा में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर जमकर हमला बोला.
मध्य प्रदेश के रायसेन में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा कि पहले मोदी अब भाषण करते हैं और जनता यूं देखती है मीटिंग कब खत्म होगी. मूड यह आया है क्योंकि उन्होंने भरोसा तोड़ा है.
नोटबंदी सबसे बड़ा घोटाला
नोटबंदी पर बोलते हुए राहुल गांधी ने कहा कि सबसे बड़ा घोटाला नोटबंदी है. यदि नोटबंदी काले धन के खिलाफ लड़ाई थी तो लाइन में सिर्फ किसान, मजदूर और छोटे व्यापारी क्यों दिखे, सूट-बूट वाले क्यों नहीं दिखे.
मोदी ने 3.5 लाख करोड़ रुपए माफ कर दिए. मनरेगा चलाने के लिए साल के 35 हजार करोड़ रुपए लगते हैं. ऐसे 10 मनरेगा के लिए उन्होंने 15 लोगों के 3.5 लाख करोड़ रुपए माफ कर दिए. राज्य के युवा खासकर यहां इस विधानसभा क्षेत्र के युवा कहते हैं कि मोदी जी यहां हमारी इंडस्ट्री बंद हो गई जो पहले था वो खत्म हो गई, रोजगार खत्म हो गए. यहां आपने कितना पैसा लगाया, लेकिन उसका कोई जवाब नहीं.
राहुल गांधी ने कहा कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने उनके ऑफिस गए और उन्होंने किसानों की कर्जमाफी की बात कही तो प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं बोला.
कुछ ही लोगों के लिए आए 'अच्छे दिन'
उन्होंने कहा कि मोदी जी ने कहा था 'अच्छे दिन' आएंगे और साढ़े चार साल तक जनता ने इंतजार किया, फिर जनता ने कहा ये झूठा है, नरेंद्र मोदी के दिल से सच्चाई नहीं निकलती. उन्होंने आगे कहा कि अनिल अंबानी, नीरव मोदी, विजय माल्या से पूछो तो वो कहते हैं 'अच्छे दिन' आ गए, जबकि जनता कहती है चौकीदार चोर है.
राहुल गांधी ने कहा कि छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रचार खत्म हुआ और कांग्रेस पार्टी की लहर आई, वैसा ही मध्य प्रदेश, राजस्थान में और बाकी जगह पर होने वाला है.
रोजगार देने में नाकाम रही सरकार
विदिशा के बासौदा में चुनावी रैली के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि जिन राज्यों में चुनाव है, वहां पर बेरोजगारी और किसानों की खराब माली हालत सबसे बड़ा मुद्दा है. जब युवाओं से पूछो तो कि वो क्या करते हैं तो वह कहते हैं कि कुछ नहीं.
राहुल गांधी बोले कि जब मोदी जी प्रधानमंत्री बने थे, तो उन्होंने हर रैली में कहा था कि 2 करोड़ लोगों को रोजगार देंगे, 15 लाख रुपए देंगे. साढ़े चार साल हो गए, लेकिन कुछ नहीं हुआ. राहुल बोले कि चीन की सरकार एक दिन में कई हजार लोगों को रोजगार देती है, लेकिन हमारी सरकार सिर्फ 400 लोगों को ही रोजगार दे पाती है.
मध्य प्रदेश के रायसेन में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा कि पहले मोदी अब भाषण करते हैं और जनता यूं देखती है मीटिंग कब खत्म होगी. मूड यह आया है क्योंकि उन्होंने भरोसा तोड़ा है.
नोटबंदी सबसे बड़ा घोटाला
नोटबंदी पर बोलते हुए राहुल गांधी ने कहा कि सबसे बड़ा घोटाला नोटबंदी है. यदि नोटबंदी काले धन के खिलाफ लड़ाई थी तो लाइन में सिर्फ किसान, मजदूर और छोटे व्यापारी क्यों दिखे, सूट-बूट वाले क्यों नहीं दिखे.
मोदी ने 3.5 लाख करोड़ रुपए माफ कर दिए. मनरेगा चलाने के लिए साल के 35 हजार करोड़ रुपए लगते हैं. ऐसे 10 मनरेगा के लिए उन्होंने 15 लोगों के 3.5 लाख करोड़ रुपए माफ कर दिए. राज्य के युवा खासकर यहां इस विधानसभा क्षेत्र के युवा कहते हैं कि मोदी जी यहां हमारी इंडस्ट्री बंद हो गई जो पहले था वो खत्म हो गई, रोजगार खत्म हो गए. यहां आपने कितना पैसा लगाया, लेकिन उसका कोई जवाब नहीं.
राहुल गांधी ने कहा कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने उनके ऑफिस गए और उन्होंने किसानों की कर्जमाफी की बात कही तो प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं बोला.
कुछ ही लोगों के लिए आए 'अच्छे दिन'
उन्होंने कहा कि मोदी जी ने कहा था 'अच्छे दिन' आएंगे और साढ़े चार साल तक जनता ने इंतजार किया, फिर जनता ने कहा ये झूठा है, नरेंद्र मोदी के दिल से सच्चाई नहीं निकलती. उन्होंने आगे कहा कि अनिल अंबानी, नीरव मोदी, विजय माल्या से पूछो तो वो कहते हैं 'अच्छे दिन' आ गए, जबकि जनता कहती है चौकीदार चोर है.
राहुल गांधी ने कहा कि छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रचार खत्म हुआ और कांग्रेस पार्टी की लहर आई, वैसा ही मध्य प्रदेश, राजस्थान में और बाकी जगह पर होने वाला है.
रोजगार देने में नाकाम रही सरकार
विदिशा के बासौदा में चुनावी रैली के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि जिन राज्यों में चुनाव है, वहां पर बेरोजगारी और किसानों की खराब माली हालत सबसे बड़ा मुद्दा है. जब युवाओं से पूछो तो कि वो क्या करते हैं तो वह कहते हैं कि कुछ नहीं.
राहुल गांधी बोले कि जब मोदी जी प्रधानमंत्री बने थे, तो उन्होंने हर रैली में कहा था कि 2 करोड़ लोगों को रोजगार देंगे, 15 लाख रुपए देंगे. साढ़े चार साल हो गए, लेकिन कुछ नहीं हुआ. राहुल बोले कि चीन की सरकार एक दिन में कई हजार लोगों को रोजगार देती है, लेकिन हमारी सरकार सिर्फ 400 लोगों को ही रोजगार दे पाती है.
Tuesday, October 23, 2018
कार पीछे करने की बात पर विवाद; शिक्षिका और उसके दोस्त को पीटा, धमकाया
एमपी नगर जोन-1 में सड़क पर कार को पीछे लेने के विवाद पर तीन युवकों ने कार से उतरकर एक शिक्षिका से मारपीट कर दी। आरोपियों ने शिक्षिका का वीडियो बनाते हुए उसके दोस्त को भी पीट दिया। इसके बाद धमकाते हुए वहां से चले गए। पुलिस 24 घंटे बाद भी आरोपियों की पहचान नहीं कर पाई है।
गौतम नगर निवासी 25 वर्षीय महिला एमपी नगर स्थित एक कोचिंग में शिक्षिका है। एमपी नगर पुलिस के अनुसार रविवार शाम वह अपने दोस्त विवेक के साथ कार से एमपी नगर जोन-1 स्थित एक रेस्टारेंट आई थी। ज्योति टॉकीज से सर्विस रोड से बोर्ड ऑफिस की तरफ जाते वक्त उनके सामने एक कार आ गई।
रास्ता नहीं होने पर शिक्षिका ने कार पीछे करने को कहा : स्ता नहीं होने पर शिक्षिका ने ड्राइवर को कार पीछे करने को कहा। इससे गुस्साए कार ड्राइवर समेत तीन लोगों ने शिक्षिका से मारपीट शुरू कर दी। उन्होंने उनका वीडियो बनाना शुरू कर दिया। उन्होंने कार में बैठे विवेक.
के गले में किसी धारदार चीज से हमला कर किया। शिक्षिका ने पुलिस को बताया कि उनके परिचित ने बीच-बचाव कर उन्हें किसी तरह बचाया। देर रात थाने पहुंचकर उन्होंने कार नंबर पर मामला दर्ज कराया।
पीछे कार लगा दी, फिर मारपीट शुरू कर दी : शिक्षिका को बोर्ड आफिस की तरफ जाना था, लेकिन उनकी कार के पीछे काफी वाहन होने के कारण वह कार को रिवर्स नहीं कर पा रही थीं, जबकि आल्टो कार चालक अपनी कार को पीछे लेने को तैयार नहीं था। दो मिनट बाद.
आल्टो से एक युवक उतरा और शिक्षिका के बगल में बैठे छात्र की कॉलर पकड़कर कार की खिड़की से बाहर खींचने की कोशिश करने लगा। छात्र बाहर निकला तो उसके साथ मारपीट कर गले पर धारदार हथियार से चोट पहुंचाई, यह देखकर शिक्षिका भी बाहर निकल आई तो आरोपितों ने मिलकर उनको थप्पड़ मारे और उन्हें पार्किंग में खड़ी कार के ऊपर धकेल दिया।
गौतम नगर निवासी 25 वर्षीय महिला एमपी नगर स्थित एक कोचिंग में शिक्षिका है। एमपी नगर पुलिस के अनुसार रविवार शाम वह अपने दोस्त विवेक के साथ कार से एमपी नगर जोन-1 स्थित एक रेस्टारेंट आई थी। ज्योति टॉकीज से सर्विस रोड से बोर्ड ऑफिस की तरफ जाते वक्त उनके सामने एक कार आ गई।
रास्ता नहीं होने पर शिक्षिका ने कार पीछे करने को कहा : स्ता नहीं होने पर शिक्षिका ने ड्राइवर को कार पीछे करने को कहा। इससे गुस्साए कार ड्राइवर समेत तीन लोगों ने शिक्षिका से मारपीट शुरू कर दी। उन्होंने उनका वीडियो बनाना शुरू कर दिया। उन्होंने कार में बैठे विवेक.
के गले में किसी धारदार चीज से हमला कर किया। शिक्षिका ने पुलिस को बताया कि उनके परिचित ने बीच-बचाव कर उन्हें किसी तरह बचाया। देर रात थाने पहुंचकर उन्होंने कार नंबर पर मामला दर्ज कराया।
पीछे कार लगा दी, फिर मारपीट शुरू कर दी : शिक्षिका को बोर्ड आफिस की तरफ जाना था, लेकिन उनकी कार के पीछे काफी वाहन होने के कारण वह कार को रिवर्स नहीं कर पा रही थीं, जबकि आल्टो कार चालक अपनी कार को पीछे लेने को तैयार नहीं था। दो मिनट बाद.
आल्टो से एक युवक उतरा और शिक्षिका के बगल में बैठे छात्र की कॉलर पकड़कर कार की खिड़की से बाहर खींचने की कोशिश करने लगा। छात्र बाहर निकला तो उसके साथ मारपीट कर गले पर धारदार हथियार से चोट पहुंचाई, यह देखकर शिक्षिका भी बाहर निकल आई तो आरोपितों ने मिलकर उनको थप्पड़ मारे और उन्हें पार्किंग में खड़ी कार के ऊपर धकेल दिया।
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